राजा राममोहन राय की पुण्यतिथि: सामाजिक सुधार और आधुनिक भारत की नींव रखने वाले महान सुधारक को नमन
नई दिल्ली, 27 सितंबर 2026। भारत के सामाजिक और बौद्धिक इतिहास में राजा राममोहन राय का नाम महत्वपूर्ण स्थान रखता है। 27 सितंबर को उनकी पुण्यतिथि पर देश उनके सामाजिक सुधार, शिक्षा के प्रसार और रूढ़ियों के खिलाफ उनके प्रयासों को याद करता है।
राजा राममोहन राय का जन्म 22 मई 1772 को बंगाल के राधानगर में हुआ था। उनका निधन 27 सितंबर 1833 को ब्रिस्टल, इंग्लैंड में हुआ। भारत सरकार के प्रकाशन में उन्हें समाज सुधारक, शिक्षाविद्, पत्रकार और भारतीय पुनर्जागरण का अग्रदूत बताया गया है।
सती प्रथा के खिलाफ उठाई आवाज
राजा राममोहन राय उन प्रमुख भारतीय सुधारकों में थे जिन्होंने महिलाओं की स्थिति और सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ आवाज उठाई। विशेष रूप से सती प्रथा के विरोध में उनके प्रयासों को भारतीय सामाजिक सुधार के इतिहास में महत्वपूर्ण माना जाता है। उन्होंने शिक्षा और सामाजिक जागरूकता को परिवर्तन का माध्यम बनाया।
शिक्षा और पत्रकारिता को दिया महत्व
राममोहन राय का मानना था कि समाज में स्थायी परिवर्तन के लिए आधुनिक शिक्षा और तर्कपूर्ण विचार आवश्यक हैं। उन्होंने पत्रकारिता के माध्यम से भी सामाजिक और धार्मिक मुद्दों पर चर्चा को बढ़ावा दिया। उनके लेखन और सार्वजनिक गतिविधियों ने 19वीं सदी के भारत में नए विचारों के प्रसार में भूमिका निभाई।
ब्रह्म सभा और सामाजिक-धार्मिक सुधार
1828 में उन्होंने ब्रह्म सभा की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जो आगे चलकर ब्रह्म समाज के रूप में विकसित हुई। यह आंदोलन धार्मिक और सामाजिक सुधार से जुड़े विचारों के प्रसार का एक महत्वपूर्ण मंच बना।
आज भी प्रासंगिक हैं उनके विचार
राजा राममोहन राय का जीवन यह बताता है कि सामाजिक बदलाव केवल कानूनों से नहीं, बल्कि शिक्षा, विचार और सार्वजनिक संवाद से भी आता है। उनके योगदान को याद करना भारतीय समाज में सुधार और आधुनिक विचारों के विकास की उस ऐतिहासिक यात्रा को समझने का अवसर है।
27 सितंबर को उनकी पुण्यतिथि पर भारत एक ऐसे समाज सुधारक को श्रद्धांजलि देता है, जिसने अपने समय की स्थापित मान्यताओं पर सवाल उठाए और सामाजिक परिवर्तन के लिए निरंतर प्रयास किया।




