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भारत की पहचान उसकी भाषाई और सांस्कृतिक विविधता में है। देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग भाषाएँ बोली जाती हैं, लेकिन यही विविधता भारत को मजबूत बनाती है। ऐसे में केवल भाषा के आधार पर किसी व्यक्ति को अपमानित करना, डराना या उसके अधिकारों को सीमित करना किसी भी लोकतांत्रिक समाज के लिए चिंता का विषय होना चाहिए।
मुंबई जैसे महानगर की पहचान ही देश के अलग-अलग राज्यों से आए लोगों की मेहनत और भागीदारी से बनी है। महाराष्ट्र की मराठी भाषा और संस्कृति का सम्मान होना चाहिए, लेकिन इसके साथ यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि दूसरे राज्यों से आए नागरिकों के साथ उनकी भाषा के आधार पर भेदभाव न हो। किसी भाषा को सम्मान दिलाने का रास्ता दूसरी भाषा बोलने वालों को नीचा दिखाना नहीं हो सकता।
भाषा सम्मान का विषय है, दबाव का नहीं
भाषा सीखना संवाद और संस्कृति को समझने का माध्यम होना चाहिए, भय या मजबूरी का नहीं। यदि किसी व्यक्ति से कहा जाए कि वह एक विशेष भाषा नहीं बोलता तो उसे यहां रहने या काम करने का अधिकार नहीं है, तो यह सवाल केवल भाषा तक सीमित नहीं रहता। यह नागरिकों के बीच समानता, सम्मान और सह-अस्तित्व से जुड़ा प्रश्न बन जाता है।
आज यदि हिंदी भाषी व्यक्ति को भाषा के नाम पर निशाना बनाया जाता है, तो कल किसी अन्य राज्य में किसी दूसरी भाषा के लोगों के साथ भी ऐसी स्थिति पैदा हो सकती है। इसलिए इस विषय को किसी एक समुदाय बनाम दूसरे समुदाय के रूप में देखने के बजाय व्यापक नागरिक अधिकारों और सामाजिक सद्भाव के दृष्टिकोण से देखना जरूरी है।
राजनीतिक और सामाजिक नेतृत्व की जिम्मेदारी
ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर राजनीतिक दलों, जनप्रतिनिधियों, सामाजिक संगठनों और नागरिक समाज की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। मतभेद होना लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन भाषा के आधार पर किसी समुदाय के विरुद्ध माहौल बनने पर स्पष्ट रूप से कानून और संवैधानिक मूल्यों के पक्ष में खड़ा होना आवश्यक है।
सरकारों और प्रशासन से भी अपेक्षा की जाती है कि वे कानून-व्यवस्था बनाए रखें और किसी भी नागरिक के साथ भाषा, क्षेत्र या पहचान के आधार पर अन्याय न होने दें। यदि कहीं शिकायत या उत्पीड़न की घटना होती है, तो उसकी निष्पक्ष जांच और उचित कार्रवाई होनी चाहिए।
विदेशों में भारतीयों के लिए भी यही संदेश
भारत से बड़ी संख्या में लोग रोजगार, शिक्षा और व्यवसाय के लिए दुनिया के अलग-अलग देशों में जाते हैं। वे वहां स्थानीय भाषाओं और संस्कृतियों का सम्मान करते हैं और कई बार स्थानीय भाषा सीखते भी हैं। लेकिन यदि भारत में हम यह संदेश देने लगें कि किसी व्यक्ति को केवल उसकी भाषा के कारण अपमानित किया जा सकता है, तो यह हमारे अपने बहुलतावादी मूल्यों को कमजोर करेगा।
हमें दुनिया के सामने ऐसा भारत प्रस्तुत करना चाहिए जहां अलग-अलग भाषाएं बोलने वाले लोग एक-दूसरे की संस्कृति का सम्मान करते हुए साथ रह सकें।
देश की एकता विविधता से मजबूत होती है
भारत की एकता किसी एक भाषा पर आधारित नहीं है। यह संविधान, समान नागरिक अधिकारों और आपसी सम्मान पर आधारित है। हिंदी, मराठी, तमिल, तेलुगु, बंगाली, कन्नड़, गुजराती, पंजाबी, मलयालम, असमिया और देश की तमाम अन्य भाषाएं भारत की साझा विरासत का हिस्सा हैं।
किसी भाषा के सम्मान के लिए दूसरी भाषा के प्रति नफरत पैदा करना आवश्यक नहीं है। अपनी मातृभाषा पर गर्व और दूसरी भाषाओं के प्रति सम्मान—दोनों साथ-साथ चल सकते हैं।
भाषा को विवाद और विभाजन का हथियार बनाने के बजाय संवाद और जुड़ाव का माध्यम बनाया जाना चाहिए। लोकतंत्र में असहमति हो सकती है, लेकिन नागरिकों का सम्मान और कानून के सामने समानता किसी भी विवाद से ऊपर होनी चाहिए।
भारत की ताकत उसकी अनेक भाषाओं में है, और उसकी एकता इस बात में है कि इन भाषाओं को बोलने वाले लोग एक-दूसरे के साथ सम्मानपूर्वक रह सकें।