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“जमीन छोट हो सकेला, बाकिर मेहनत करे वाला किसान के सपना कबो छोट ना होला।”
बिहार के एगो छोट गाँव रहे—सोनबरसा। गाँव के चारों ओर हरियर खेत, पोखरा, आम के बगइचा आ मिट्टी के खुशबू। गाँव के अधिकतर लोग खेती पर निर्भर रहे।
ओही गाँव में रामजी यादव नाम के एगो किसान रहत रहे।
रामजी के पास बहुत जमीन ना रहे। कुल मिलाके कुछ बीघा खेत रहे। परिवार में मेहरारू, दू गो लइका आ बूढ़ माई-बाबूजी रहले।
हर साल रामजी खेती करत रहे, बाकिर मौसम के भरोसा पर सब कुछ निर्भर रहे।
कभी सूखा पड़ जाव, कभी जरूरत से ज्यादा बरखा हो जाव। फसल खराब होखे त पूरा परिवार के खर्च चलावल मुश्किल हो जात रहे।
गाँव के कुछ लोग अक्सर रामजी से कहत रहले—
“रामजी, खेती में अब कुछ नइखे रखल। शहर जा आ नौकरी कर।”
रामजी मुस्कुरा के कहत—
“खेती छोड़ देब त खाना कहाँ से आई?”
बाकिर मन के अंदर ऊ खुद परेशान रहे।
एक रात ऊ अपना खेत के मेड़ पर बइठल रहे। चाँदनी में खेत के तरफ देखत ऊ सोचत रहे—
“का खेती के तरीका बदलल ना जा सकेला?”
अगिला दिन रामजी के बेटा सोनू शहर से गाँव आइल।
सोनू मोबाइल पर खेती से जुड़ल बहुत वीडियो देखत रहे। ऊ अपना बाबूजी से कहलस—
“बाबूजी, आजकल किसान लोग नया तरीका से खेती कर रहल बा। माटी के जांच, ड्रिप सिंचाई, जैविक खाद आ बाजार के जानकारी से कम जमीन में भी अच्छा कमाई हो सकेला।”
रामजी पहिले हँस पड़ल।
“हमरा का मालूम ई सब?”
सोनू कहलस—
“सीखल जा सकेला बाबूजी।”
ई बात रामजी के दिल में बस गइल।
सोनू के साथ रामजी नजदीकी कृषि केंद्र गइल।
वहाँ माटी के जांच करववलस।
रिपोर्ट आइल त पता चलल कि खेत में कुछ पोषक तत्व के कमी बा।
अधिकारी रामजी के सलाह देलें कि सही खाद के इस्तेमाल करे आ फसल के तरीका बदले।
रामजी पहली बेर बुझल कि खेती खाली हल चलावे आ बीज बो देवे के नाम ना ह।
खेती भी विज्ञान ह।
रामजी अपना पूरा खेत पर एक साथ प्रयोग करे के जोखिम ना लिहलस।
ऊ कुछ जमीन पर नया तरीका अपनवलस।
बेहतर बीज, जैविक खाद, पानी के सही इस्तेमाल आ समय पर कीटनाशक नियंत्रण।
गाँव के लोग ओकरा के देख के हँसे लगलें।
“देखऽ, रामजी अब मोबाइल देख के खेती करी!”
रामजी कुछ ना कहलस।
ऊ बस मेहनत करत रहल।
कुछ महीना बाद खेत में फसल लहलहा उठल।
रामजी के खेत गाँव के बाकी खेत से अलग दिखाई देवे लागल।
उपज बढ़ गइल।
पानी के खर्च कम भइल।
सबसे बड़ी बात—रामजी के कमाई पिछला साल से काफी बढ़ गइल।
अब ओही लोग, जे ओकर मजाक उड़ावत रहे, सलाह लेवे खातिर ओकरा खेत पर आवे लागल।
रामजी के मन में एगो नया विचार आइल।
ऊ सोचलस—
“अगर हम अकेले फायदा उठाइब त गाँव के का फायदा?”
ऊ गाँव के किसानन के एक जगह बोलवलस।
सबके अपना अनुभव बतवलस।
“हमनी के मिलके खेती करे के चाहीं। बीज एक साथ खरीदीं, खाद सस्ता में लीं आ फसल बेचत समय व्यापारी से सही दाम माँगीं।”
शुरुआत में कुछ किसान जुड़लें।
धीरे-धीरे संख्या बढ़त गइल।
गाँव में किसान समूह बन गइल।
अब किसान लोग बाजार के भाव पहिले से पता कर लेत रहे।
कवन फसल के मांग बा, कब बोआई करे के बा, कितना पानी चाहीं—ई सब जानकारी आपस में साझा होखे लागल।
कुछ किसान सब्जी उगावे लगलें।
कुछ फल के खेती शुरू कइलें।
कुछ लोग पशुपालन से अतिरिक्त कमाई करे लगलें।
गाँव के आमदनी धीरे-धीरे बढ़े लागल।
रामजी के सपना अब खाली अपना परिवार तक सीमित ना रहे।
एक दिन रामजी के बूढ़ बाबूजी खेत पर आइलें।
हरियर फसल देख के बहुत देर तक चुप रहलें।
फेरु कहलें—
“बबुआ, हम जिंदगी भर खेती कइनी, बाकिर आज पहिला बेर लागत बा कि खेती के नया रास्ता भी हो सकेला।”
रामजी बाबूजी के हाथ पकड़ के कहलस—
“बाबूजी, रउआ लोग हमनी के जमीन दिहनी। अब ओकरा के बचावल आ आगे बढ़ावल हमनी के जिम्मेदारी बा।”
बाबूजी के आँख में खुशी के आँसू आ गइल।
कुछ समय बाद सोनू के शहर में एगो बढ़िया नौकरी के मौका मिलल।
रामजी कहलस—
“जा बेटा, अपना भविष्य बनावऽ।”
सोनू कुछ देर चुप रहल।
फेरु कहलस—
“बाबूजी, नौकरी करब जरूर, बाकिर गाँव के खेती के काम भी ना छोड़ब। हम चाहतानी कि हमार गाँव के किसान लोग के आपन माल बेचेला शहर के चक्कर ना लगावे के पड़े।”
रामजी मुस्कुरा दिहलस।
अब बाप आ बेटा मिलके गाँव के किसानन खातिर एगो छोट डिजिटल सहायता केंद्र शुरू करे के योजना बनावे लगलें।
कुछ साल बाद सोनबरसा गाँव में बहुत बदलाव आ गइल।
किसान अब मौसम, बाजार आ खेती के नई तकनीक के जानकारी लेवे लगलें।
कई परिवार के आमदनी बढ़ल।
गाँव के कुछ जवान, जे शहर जाए के सोचत रहलें, ऊ लोग गाँव में ही खेती आधारित व्यवसाय शुरू कइलें।
एक दिन पंचायत भवन में गाँव के लोग रामजी के सम्मान कइलें।
रामजी मंच पर खड़ा होके कहलस—
“हमरा सपना अकेले अमीर बने के ना रहे। हम चाहत रहीं कि हमार गाँव के कवनो किसान मजबूरी में आपन जमीन छोड़ के परदेस ना जाए।”
पूरा पंचायत भवन तालियन से गूंज उठल।
रामजी के आँख नम हो गइल।
रामजी के कहानी बतावेला कि समस्या चाहे जेतना बड़ा होखे, अगर इंसान सीखल, मेहनत कइल आ बदलाव अपनावल ना छोड़े, त रास्ता जरूर निकल सकेला।
किसान खाली अन्नदाता ना होला। ऊ देश के भविष्य के नींव ह।
बिहार के गाँव में आजो हजारों किसान कठिन परिस्थिति में मेहनत करत बाड़ें। जरूरत बा कि उनकर मेहनत के साथ सही जानकारी, तकनीक आ बाजार तक पहुँच भी मिले।
सपना देखे खातिर जमीन बड़ी होखे के जरूरत नइखे—हिम्मत बड़ी होखे के चाहीं।
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