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“माई के ममता के कवनो कीमत ना होला, बाकिर जब माई ना रहेले, त उनकर हर बात जिनगी भर याद रहेला।”
बिहार के एगो छोट गाँव रहे—देवपुर। गाँव के चारों ओर हरियर खेत, कच्चा-पक्का घर, आम के बगइचा आ बीच से गुजरत एगो पतली सड़क। एह गाँव में रहत रहले श्यामलाल आ उनकर मेहरारू जानकी देवी।
जानकी देवी के एगो बेटा रहे—अमन।
अमन बचपन से पढ़ाई में तेज रहे। ओकर सपना रहे कि ऊ बड़ा होके शहर में नौकरी करी आ अपना परिवार के गरीबी दूर करी।
माई हमेशा कहत रहली—
“बबुआ, तू खूब पढ़ऽ। तोहार सफलता में ही हमार खुशी बा।”
कॉलेज के पढ़ाई पूरा कइला के बाद अमन के एगो कंपनी में नौकरी मिल गइल। नौकरी शहर में रहे।
गाँव छोड़ के शहर जाए के समय जानकी देवी के आँख में आँसू रहे।
माई कहलस—
“बबुआ, शहर में जा रहल बाड़ऽ, खूब मेहनत करिहऽ। बाकिर एगो बात हमेशा याद रखिहऽ—जेतना ऊँच उड़ऽ, अपना घर के माटी के कबो मत भुलइहऽ।”
अमन हँसत कहलस—
“माई, अइसन कइसे हो सकेला? रउआ के कबो ना भुलाइब।”
अमन शहर चल गइल।
शुरुआत में ऊ रोज माई से फोन पर बात करत रहे। माई रोज पूछत रहली—
“खाना खइला?”
“समय से सुतऽ।”
“पइसा बचा के रखिहऽ।”
अमन हर बेर कहत—
“माई, अब हम छोट बच्चा ना हईं।”
माई हँस पड़त रहली।
कुछ महीना बाद अमन के काम बढ़ गइल।
पहिले रोज फोन होत रहे, फेरु दू दिन में, फेरु हफ्ता में।
जानकी देवी फोन के इंतजार करत रहली।
कई बेर ऊ खुद फोन करत रहली, बाकिर अमन कहत—
“माई, अभी मीटिंग में बानी। बाद में फोन करब।”
“ठीक बा बबुआ।”
बाकिर ऊ “बाद में” कई बेर ना आइल।
माई गाँव में अकेले ओकर इंतजार करत रहली।
हर हफ्ता ऊ अमन के एगो चिट्ठी लिखत रहली।
“बबुआ, आज खेत में धान खूब बढ़िया भइल बा।”
“बबुआ, तोहार पसंद के अचार बनवले बानी।”
“बबुआ, ठंड बढ़ गइल बा। अपना ख्याल रखिहऽ।”
अमन चिट्ठी पढ़त रहे, बाकिर जवाब देवे के समय ना निकाल पावत रहे।
एक रात अमन के फोन बजल।
गाँव से फोन रहे।
अमन फोन उठवलस।
“हेलो?”
सामने ओकर चाचा रहले।
कुछ पल चुप रहला के बाद चाचा कहलें—
“अमन… बेटा, जल्दी गाँव आ जा।”
अमन घबरा गइल।
“का भइल चाचा?”
चाचा के आवाज भारी हो गइल—
“तोहार माई बहुत बीमार बाड़ी।”
अमन अगिला ट्रेन पकड़ के गाँव खातिर निकल पड़ल।
रास्ता भर ओकरा माई के चेहरा याद आवत रहे।
ओकरा याद आइल कि पिछला कई महीना से ऊ माई से ठीक से बात तक ना कइले रहे।
जब अमन गाँव पहुँचल, घर के बाहर बहुत लोग जुटल रहे।
अमन के दिल जोर-जोर से धड़कत रहे।
ऊ घर के अंदर गइल।
आँगन में माई के चारपाई खाली रहे।
चाचा ओकर कंधा पकड़ के धीरे से कहलें—
“बबुआ… जानकी अब ना रहली।”
अमन के पैर के नीचे से जमीन खिसक गइल।
ऊ चारपाई पर गिर पड़ल।
“माई…!”
बाकिर जवाब देवे वाला अब केहू ना रहे।
कुछ देर बाद चाचा अमन के एगो पुरान डिब्बा देलें।
“ई तोहरा माई तोहरा खातिर रखले रहली।”
डिब्बा के अंदर कई गो चिट्ठी रहे।
सब चिट्ठी अमन के नाम से लिखल रहे।
सबसे ऊपर एगो चिट्ठी पर लिखल रहे—
“बबुआ खातिर—आखिरी चिट्ठी।”
अमन काँपत हाथ से चिट्ठी खोललस।
चिट्ठी में लिखल रहे—
“बबुआ,
हम ना जानतानी कि ई चिट्ठी तोहरा हाथ में कब पहुँची।
हमरा तोहरा से कवनो शिकायत नइखे।
हम जानतानी कि तू बहुत मेहनत करताड़ऽ।
बस एगो बात याद रखिहऽ—पैसा कमावे के चक्कर में अपना लोग खातिर समय निकालल मत भुलिहऽ।
हमरा तोहरा से कुछ ना चाहीं।
ना महंगा कपड़ा।
ना बड़ा घर।
ना बहुत पइसा।
हमरा बस तोहार दू गो बात सुनल अच्छा लागेला।
जब भी समय मिले, घर आ जइहऽ।
माई के घर तोहरा बिना अधूरा लागेला।
तोहार माई।”
चिट्ठी पढ़त-पढ़त अमन के आँख से आँसू गिरत रहल।
अमन कई दिन गाँव में रहल।
पहिले ओकरा लागल कि ऊ सब कुछ खो दिहलस।
बाकिर धीरे-धीरे ओकरा बुझाइल कि माई ओकरा के एगो आखिरी सीख देके गइल बाड़ी।
ऊ शहर वापस गइल, बाकिर अब ओकर जिनगी पहिले जइसन ना रहे।
ऊ नौकरी करत रहल, बाकिर परिवार खातिर समय निकाले लागल।
बाबूजी के शहर बोलववलस।
गाँव में एगो छोट लाइब्रेरी बनववलस।
गरीब बच्चन के पढ़ाई में मदद करे लागल।
आ हर साल माई के बरसी पर गाँव में गरीब लोग खातिर खाना खिलावे लागल।
एक दिन ऊ माई के आखिरी चिट्ठी फेरु पढ़त रहे।
ओकर आँख में आँसू रहे, बाकिर चेहरा पर मुस्कान रहे।
ऊ धीरे से कहलस—
“माई, अब समझ में आ गइल—सफलता खाली पैसा कमाए के नाम ना ह। सफलता त ऊ ह, जेकरा से अपना लोग के चेहरा पर मुस्कान आवे।”
जिंदगी में पैसा, नौकरी आ सफलता जरूरी बा। बाकिर परिवार आ अपन लोग के समय देल भी ओतने जरूरी बा।
माई-बाप हमेशा हमनी से बहुत कुछ ना माँगेलें। कई बेर उनकर सबसे बड़ा इच्छा बस एतने होला कि उनका के अपना बच्चन के आवाज सुनाई दे जाव।
समय रहते अपना माई-बाप के महत्व समझीं, काहेकि बीतल समय फेरु वापस ना आवेला।
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